संगठन गीत
भारतीय शिक्षा से हो, भारत माँ का पुनरुत्थान ।
विश्वगुरु के पद पर बैठी, माता पाए गौरव स्थान ।। धृ ।।
मुक्तकरी हो विद्या फिर से, मुक्त करें जो जीवमात्र को
निर्धनता के अंधकार के, दास्यभाव के तोड़ बंध को
युक्तकरी हो शिक्षा अपनी, स्वाभिमान से भर दें मनको
अर्थकरी हो स्वावलंबी हो, राष्ट्र जागरण का अभियान ।। 1 ।।
शासन से हो पूर्ण मुक्त यह, समाजपोषित शिक्षा नीति
पूर्ण स्वतंत्र हो पूर्ण मुक्त हो, विद्वानों की शाश्वत थाती
नगर ग्राम जनपद से निकली, पूर्ण विकेन्द्रित निर्णय नीति
आर्थिक शैक्षिक सामाजिक हो, शिक्षा का स्वायत्त विधान ।। 2 ।।
राष्ट्रभाव से पाठ भरें हो, सत्य सनातन मूल्याधिष्ठित
गौरव जागे भक्ति उपजे, सेवाव्रत में हर जन स्थापित
पूर्ण विकसित हर चरित्र हो, सर्व कला संपन्न सुनिश्चित
कौशल विकसे तेज भी chamke, छात्र-छात्र फिर बनें महान ।। 3 ।।
रसमय होवे सारी-शिक्षा, वातावरण हो खुला प्रसन्न
नाचें गाएं खेलें कूदें, चित्त को सींचे खिले सुमन
भीतर जलता ज्ञानदीप जो, करें प्रकाशित विश्व गगन
एकलव्य से शिष्य बने सब, शिक्षक सब चाणक्य समान ।। 4 ।।
मिलजुल कर हम शिक्षा बदलें, जागृत वैचारिक आंदोलन
शोध करें हम करें जागरण, और प्रशिक्षण और प्रकाशन
नित्य करें साप्ताहिक चिंतन, बढ़ें मंडल गढ़ें संगठन
साथ मिलें सब साथ विचारें, साथ करें अब कार्य महान ।। 5 ।।
भारतीय शिक्षण मंडल