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बी.एस.एम. भारत

शिक्षण मंडल
नवाचार

विद्यार्थी विकसन

विकास और विकसन में मौलिक अंतर

भारतीय शिक्षण मंडल के दृष्टिकोण में 'विद्यार्थी विकास' और 'विद्यार्थी विकसन' में एक बहुत बड़ा और मौलिक अंतर है। 'विकास' प्रायः बाहर से थोपा जाता है (जैसे सूचनाएं रटाना, अंक लाने का दबाव बनाना या बाहरी आचरण बदलना)। इसके विपरीत, 'विकसन' का अर्थ है— भीतर की शक्तियों का स्वाभाविक प्रकटीकरण। जैसे एक कली को बाहर से खींचकर फूल नहीं बनाया जा सकता, बल्कि अनुकूल वातावरण मिलने पर वह स्वतः भीतर से खिलती है, ठीक वैसे ही बालक के भीतर छिपी अनंत क्षमताओं को प्रकट करना ही 'विद्यार्थी विकसन' है।

पंचकोश आधारित समग्र विकास

भारतीय शिक्षण मंडल इसके लिए "पंचकोश आधारित समग्र विकास" का मार्ग प्रशस्त करता है। भारतीय शिक्षा दर्शन के अनुसार, विद्यार्थी का विकसन केवल परीक्षा पास करने या नौकरी पाने तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को निखारना है, जिसके पाँच आयाम हैं:

१. अन्नमय कोष (शारीरिक विकसन)

  • दृढ़ शरीर: योग, सूर्य नमस्कार, पारंपरिक खेल (जैसे कबड्डी, खो-खो) और व्यायाम के माध्यम से शरीर को सुदृढ़ बनाना।
  • सात्विक आहार: विद्यार्थियों में मौसमी, स्थानीय व पौष्टिक भोजन के प्रति जागरूकता विकसित करना और जंक फूड के प्रति आकर्षण कम करना।

२. प्राणमय कोष (ऊर्जात्मक विकसन)

  • ऊर्जा का नियमन: प्राणायाम, सही श्वसन क्रिया और खेल-कूद के माध्यम से बालक की आंतरिक ऊर्जा और उत्साह को सही दिशा देना।
  • इंद्रिय निग्रह: एकाग्रता बढ़ाना और चंचलता को रचनात्मक कार्यों (कला, संगीत, बागवानी) में बदलना।

३. मनोमय कोष (मानसिक एवं भावनात्मक विकसन)

  • मानसिक सुदृढ़ता: बालक को तनाव, अवसाद और असफलताओं से निपटने के लिए मानसिक रूप से मजबूत बनाना।
  • सहानुभूति और समरसता: कहानियों, नाटकों और समूह-कार्यों के माध्यम से करुणा, सहयोग, संवेदनशीलता और सामाजिक समरसता की भावना जगाना।

४. विज्ञानमय कोष (बौद्धिक एवं विवेकपरक विकसन)

  • सृजनात्मक शिक्षण: स्वाध्याय शिक्षक को जड़ता से मुक्त करता है। वह स्वयं को निरंतर समृद्ध करते हुए विद्यार्थियों के लिए सीखने के नए अवसर निर्मित करता है।
  • भारतीय ज्ञान परंपरा: गणित, विज्ञान या इतिहास पढ़ते समय भारत के गौरवशाली योगदान और स्थानीय लोक-विज्ञान से उसका परिचय कराना।

५. आनंदमय कोष (आध्यात्मिक विकसन)

  • सेवा भाव और राष्ट्रभक्ति: अपने ज्ञान का उपयोग केवल स्वयं के स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए करने की प्रेरणा पाना।
  • सहज प्रसन्नता: प्रकृति के सान्निध्य में रहना, कला-साहित्य का रसास्वादन करना और बिना किसी बाहरी कारण के भीतर से सदैव आनंदित रहना।

विकसन के लिए आनंदशाला का वातावरण

भारतीय शिक्षण मंडल के अनुसार, यदि विद्यालय में विद्यार्थी का वास्तविक विकसन करना है, तो कक्षा का वातावरण निम्नलिखित सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए:

  • भय से मुक्त: कक्षा में डर का माहौल न हो। जब विद्यार्थी बिना डरे प्रश्न पूछता है और अपनी गलती स्वीकार करता है, तभी उसका वास्तविक मानसिक विकसन शुरू होता है।
  • अनुभवजन्य अधिगम: केवल ब्लैकबोर्ड और किताबों से नहीं, बल्कि प्रयोग, क्षेत्र-भ्रमण और प्रकृति के बीच ले जाकर सिखाना।
  • स्वधर्म और रुचि का सम्मान: प्रत्येक बालक अद्वितीय है। उसकी तुलना किसी अन्य से न करके उसकी स्वयं की प्रतिभा (जैसे लेखन, खेल, नेतृत्व, कला) को पहचानना और उसे बढ़ावा देना।

विद्यार्थी विकसन का मूल सूत्र:

"अमृतस्य पुत्राः" — प्रत्येक विद्यार्थी अनंत शक्तियों और आनंद का स्रोत है। शिक्षा का कार्य उसके ऊपर सूचनाओं का बोझ लादना नहीं, बल्कि उसके भीतर के इस 'अमृतत्व' और मौलिकता को बाहर प्रकट होने का मार्ग देना है।

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