संस्थाचालक : दिशा, दृष्टि और दायित्व
भारतीय शिक्षण मंडल के शिक्षा-दर्शन में ‘संस्थाचालक परामर्श’ नेतृत्व का एक महत्वपूर्ण आयाम है। यदि शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक शिक्षा-रूपी रथ के पहिये हैं, तो संस्थाचालक उसकी दिशा निर्धारित करने वाला सारथी है।
आज प्रायः शैक्षिक प्रबंधन का ध्यान भौतिक संसाधनों, वित्तीय व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रियाओं तक सीमित रह जाता है। भारतीय शिक्षण मंडल का मानना है कि जब तक संस्थान के नेतृत्व का दृष्टिकोण स्वायत्त, सुसंस्कृत और राष्ट्रकेंद्रित नहीं होगा, तब तक कोई भी विद्यालय वास्तविक अर्थों में ‘आनंदशाला’ नहीं बन सकता।
संस्थाचालक केवल प्रशासक नहीं, बल्कि शिक्षा के उद्देश्य, मूल्यों और संस्कृति का संवाहक होता है। उसके नेतृत्व में ही संस्थान का वातावरण, कार्यपद्धति और शैक्षिक दिशा निर्मित होती है।
इसी दृष्टि से संस्थाचालक परामर्श के अंतर्गत प्रबंधन के लिए कुछ मूलभूत सिद्धांत, मूल्य और कार्य-दिशाएँ प्रस्तुत की गई हैं, जो शिक्षा को सेवा, संस्कार और राष्ट्रनिर्माण का प्रभावी माध्यम बनाने में सहायक हैं।
संस्थाचालक परामर्श के मुख्य सूत्र
1. व्यवसाय के स्थान पर राष्ट्र-पुनर्निर्माण की साधना
- शिक्षा एक पवित्र न्यास
- भारतीय दृष्टि में शिक्षा व्यापार नहीं, बल्कि समाज द्वारा सौंपी गई एक पवित्र जिम्मेदारी है। संस्थाचालक स्वयं को संस्था का स्वामी नहीं, बल्कि सेवक, संरक्षक और न्यासी माने।
- समाजहित सर्वोपरि
- संस्थान के संसाधनों और अधिशेष का उपयोग शोध, नवाचार, शिक्षक विकास, छात्र सहायता तथा शैक्षिक गुणवत्ता के संवर्धन में किया जाए; प्रदर्शन और विलासिता में नहीं।
2. आचार्यों को स्वायत्तता और सम्मान
- नियंत्रक नहीं, संरक्षक
- आचार्य केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि शिक्षण प्रक्रिया के प्रमुख सूत्रधार हैं। उन्हें मूल्याधारित नवाचार, शिक्षण पद्धति और पाठ्यक्रम विकास के लिए आवश्यक स्वतंत्रता एवं विश्वास प्रदान किया जाए।
- सतत् विकास के अवसर
- आचार्यों के बौद्धिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक उन्नयन हेतु नियमित प्रशिक्षण, स्वाध्याय, संवाद और प्रबोधन के अवसर सुनिश्चित किए जाएँ।
3. भारतीयता से युक्त शैक्षिक परिवेश
- प्रकृति-केंद्रित परिसर
- विद्यालय परिसर प्रकृति के सान्निध्य में विकसित हो, जहाँ वृक्ष, पक्षी, खुले स्थान और पर्यावरणीय संवेदनशीलता विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण का स्वाभाविक आधार बनें। परिसर पंचमहाभूतों के प्रति कृतज्ञता और प्रकृति के साथ सहअस्तित्व का भाव जागृत करे।
- संस्कृति का सजीव वातावरण
- विद्यालय की संरचना, सज्जा, गतिविधियाँ और शैक्षिक संसाधन भारत की ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय प्रेरणाओं को प्रतिबिंबित करें। परिसर का प्रत्येक आयाम भारतीय जीवनदृष्टि का परिचायक हो।
4. विश्वास, संवाद और समरसता
- सहभागी संस्थागत संस्कृति
- प्रबंधन, आचार्य, अभिभावक और विद्यार्थियों के मध्य विश्वास, पारदर्शिता और सतत संवाद पर आधारित संबंध विकसित किए जाएँ। सभी हितधारकों को संस्थान की दृष्टि, ध्येय और कार्यप्रक्रिया का सहभागी बनाया जाए।
- भयमुक्त एवं आत्मीय वातावरण
- संस्थान में ऐसा वातावरण निर्मित हो जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सम्मानपूर्वक अपने विचार व्यक्त कर सके। विश्वास, सहयोग और आत्मीयता पर आधारित कार्यसंस्कृति ही समरस एवं सशक्त शैक्षिक परिवार का आधार है।